Saturday, 20 February 2016

पतझड़ी पात


तुमने पतझड़ी पातो को देखा होगा।
प्रतीत होता है, मै भी हूँ।
गिर रहा हूँ, बिना ध्येय के।
ना कोई प्राण शेष है अब।
सिवाय निर्जीव श्वासों के।
ना है कोई दिशा, दिशाहीन हूँ।
हवाओं के झोंके तय करेंगे मेरा भाग्य।
निश्चित ही धरातल तक है सफर मेरा।
कब तक ये झोंकेे साथ ले जाएँगे।
सफर तो खत्म होना ही था।
आकांक्षाएं धूमिल होनी ही थी।
अब निर्जीव श्वासों ने भी साथ छोड़ दिया।
हरित वर्ण न जाने कब स्याह हो गया।

No comments:

Post a Comment

पतझड़ी पात

तुमने पतझड़ी पातो को देखा होगा। प्रतीत होता है, मै भी हूँ। गिर रहा हूँ, बिना ध्येय के। ना कोई प्राण शेष है अब। सिवाय निर्जीव श्वासों ...