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Monday, 30 May 2016
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पतझड़ी पात
तुमने पतझड़ी पातो को देखा होगा। प्रतीत होता है, मै भी हूँ। गिर रहा हूँ, बिना ध्येय के। ना कोई प्राण शेष है अब। सिवाय निर्जीव श्वासों ...
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कितना कुछ रह जाता है छूट जाता है और गुज़र भी रहा है पीछे न भरने वाले खड्ड मे समाता हुआ, एक अंतहीन खड्ड अंतहीन स्थान के सा...
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रोज़ मांगता हूँ उस से मुक्त कर दे मेरे "मैं " से मुझको मुक्त कर दे चेष्टा करता हूँ पर असफल हूँ मुझे मेरे "...