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Friday, 20 May 2016

मैं एवं मेरी पीडा....

अभी अभी संध्या चली गई
रजनी को बुलावा दे गई
कुछ क्षण में तिमिर आगमन हुआ
लहर चुप्पी की बह गई
अब मैं हूँ और मेरा ध्यान है
फिर भी न पूर्ण संज्ञान हैं
और भी हैं समीप यहीं
माना वो अंजान है
सो तो सकते हैं वो सभी
हमको तो नींद नसीब नहीं
कोशिश करता हूँ मैं बहुत
पर करवटें बदलता रहता हूँ
लाख जतन कर लिए
स्वयं को कोसता रहता हूँ
जुगत लगाता हूँ बहुत
पर असमर्थ खुद को पाता हूँ
कभी कभी तो यूँ ही मैं
सहसा बडबडाता हूँ
क्या है ये और
क्यूँ मुझे खाता है?
निद्रा के वक्त भी मुझे
इतना तड़पाता है
क्या ये वो मेरे स्वप्न हैं
जो मुझको सोने देते नहीं
चुभते है मेरी आँखों में
और देते हैं अश्रुओं की नमी।
नहीं चाहता इन स्वप्नों को
यह निरा खल है
मुझे सोने न देने का
मेरा स्वयं से छल है
पर ये कपटी मन है
मोल देता है इन ख्वाबो को
कहने को तो ये मेरा है
पर आता नहीं है काबू में

पतझड़ी पात

तुमने पतझड़ी पातो को देखा होगा। प्रतीत होता है, मै भी हूँ। गिर रहा हूँ, बिना ध्येय के। ना कोई प्राण शेष है अब। सिवाय निर्जीव श्वासों ...