१. कुछ लम्हों ने तान छेड़ी फिर
वो लाएं हैं उन्हें हृदय में फिर
जिनमे है दर्द चुप्पी और निराशा।
आशा! हां इसी के लिए यूं जी रहा था मैं
पर अन्य शब्द में समाहित हो निरर्थक बन गई।
२. क्या तपिश का काम तपाना नहीं?
जो जल रहा था मैं क्यूं तप न पाया?
हैरानी है मुझे उन किस्से कहानियों पर,
जो बखान करते हैं यूं तप कर चमक जाने का!
न चमक पाया मैं इतना जलकर भी,
क्या कोरे झूठ पे टिकी है दुनियां?
अब इतना भी ईंधन नहीं कि जल सकूं थोड़ा।
चमकने को थोड़ा काश जमा कर सकूं थोड़ा।
प्रशांत "अंजान"