Tuesday, 21 August 2018

जब देखा मैंने उसे

मैंने देखा उसे 
वो मुस्कुरा रही थी 
अपने कुछ परिचितों के साथ 
मंद मंद शीतल पवन सी 
कुछ बह रही थी आज 
वो रमणीय है 
मन में रमने वाली 
भीड़ में भी है कांति निराली 
अब क्या करुँ 
जानता नहीं एक शब्द मात्र 
शायद मै ना बन सकूँ 
हमसफ़र उसका 
शायद ना मिले उसका साथ 
पर सोचना इतना 
मुझे पीड़ा देता है अपार 
जिंदगी पहले ही बेहतर थी 
पर अब ना होगा उस बेहतरी का साथ 

प्रशांत अंजान 

Monday, 20 August 2018

जैसे हो वैसा है संसार

तुम साफ हो, तो साफ़ है संसार भी 
निश्चित हो, तो निश्चित है वह 
जैसा है अंतस, वैसा  है संसार 
निर्भर है तुम पर 
की कैसा है संसार

बदलोगे, तो बदलेगा 
जैसा देखते हो, दिखेगा 
मात्र वही है ,जो तुम हो 

जैसी करनी है , वो करता है वही 
जैसा बोलोगे ,वो भी  कहेगा 
जैसा सूंघना चाहते हो ,वैसी ही महक 
जैसा रस चाहोगे , वैसा ही 
वो तुम से है 
है तुम तक ही |

Tuesday, 31 May 2016

थोड़ा बोलें

जो न बोले हैं कुछ अब तक
वो भी थोड़ा बोले
चुप्पी साध रखी है अब तक
थोड़ा मुँह तो खोले
अब क्या शिखर पाना नहीं
जो ऊँचाई देख कर सिहर रहे
अंदर के पंछी से कह दो
पर को थोडा खोले
अब उडना है आसमान से
सितारों की ऊंचाई तक
कह दो अब अवरुद्धो से
पथ को यूँ ना रोके
अब चुप्पी और ना बोलेगी
चुप्पी से नाता तोडें
जो न बोले हैं कुछ अब तक
वो भी थोड़ा बोले

Monday, 30 May 2016

दुख पसंद है

आँसुओं में डूबा हुआ, मैं खुद को खुद तक पाता हूँ,
हृदय पर चोट खाकर, मैं खुद को ढूंढ पाता हूँ,
कुछ जुडाव सा है, एकांत से मेरा,
दर्द लगता है कुछ अपना सा मेरा।
दलित सी है मनःस्थिति मेरी,
विस्मृत सा हूँ मैं, हूँ खुद में तन्हा,
कुछ ऐसी ही है हृदय की व्यथा।

Friday, 20 May 2016

मैं एवं मेरी पीडा....

अभी अभी संध्या चली गई
रजनी को बुलावा दे गई
कुछ क्षण में तिमिर आगमन हुआ
लहर चुप्पी की बह गई
अब मैं हूँ और मेरा ध्यान है
फिर भी न पूर्ण संज्ञान हैं
और भी हैं समीप यहीं
माना वो अंजान है
सो तो सकते हैं वो सभी
हमको तो नींद नसीब नहीं
कोशिश करता हूँ मैं बहुत
पर करवटें बदलता रहता हूँ
लाख जतन कर लिए
स्वयं को कोसता रहता हूँ
जुगत लगाता हूँ बहुत
पर असमर्थ खुद को पाता हूँ
कभी कभी तो यूँ ही मैं
सहसा बडबडाता हूँ
क्या है ये और
क्यूँ मुझे खाता है?
निद्रा के वक्त भी मुझे
इतना तड़पाता है
क्या ये वो मेरे स्वप्न हैं
जो मुझको सोने देते नहीं
चुभते है मेरी आँखों में
और देते हैं अश्रुओं की नमी।
नहीं चाहता इन स्वप्नों को
यह निरा खल है
मुझे सोने न देने का
मेरा स्वयं से छल है
पर ये कपटी मन है
मोल देता है इन ख्वाबो को
कहने को तो ये मेरा है
पर आता नहीं है काबू में

पतझड़ी पात

तुमने पतझड़ी पातो को देखा होगा। प्रतीत होता है, मै भी हूँ। गिर रहा हूँ, बिना ध्येय के। ना कोई प्राण शेष है अब। सिवाय निर्जीव श्वासों ...