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हे परम शब्द,
मेरे शब्द को अपने में स्थायित्व प्रदान कर |
समाहित कर
कि मैं गिरूं ना|
मेरी चेतना को विस्तार दे
ताकि
जागृत कर सकूँ
उस परम पुंज को
जिससे सर्जित किया है तूने
मुझे और अन्य पुंजों को |
अपने दिव्य पुंज में
खुद को समर्पित करने का मार्ग प्रदान कर |
विकारों की जन्मदात्री ,
मेरे अंतस के उस अंश के विध्वंश हेतु
मुझे सहयोग प्रदान कर |
मेरे प्रण को
अपनी उपासना का
तुच्छ रूप समझ
इसे संबल दे |
ढृढ़ कर मुझे
यूँ बने रहने को |



