Thursday, 10 August 2023

 मेरी कविता बस कुछ शब्द नही

बढ़कर है कहीं उनसे

कुछ अंतस की बातें

कुछ पर्दें के पीछे की कहानियां

घटी और घट रहीं है जो

अपरिचित सी हैं अंजान कहीं

लिखना उन्हें एक आदत है

या यूं कहूं मेरे शब्दों से उनकी इबादत है

कभी कहना उन लफ्जों को बस में न था

तभी तो उन्हें जगजाहिर करने का साधन है


मैं ये न कहूं कि

मैं लिखता हूं

मैं नहीं पर लिखतें हैं ये भाव सभी

कुछ इच्छाएं 

कुछ स्मृतियां

कुछ मर्म

और कुछ स्थितियां 

सभी लिखतें हैं

मैं नहीं।

Friday, 5 May 2023

अनायास मन में आईं कुछ पंक्तियां....

 १. कुछ लम्हों ने तान छेड़ी फिर

      वो लाएं हैं उन्हें हृदय में फिर

       जिनमे है दर्द चुप्पी और निराशा।

        आशा! हां इसी के लिए यूं जी रहा था मैं

          पर अन्य शब्द में समाहित हो निरर्थक बन गई।


२. क्या तपिश का काम तपाना नहीं?

     जो जल रहा था मैं क्यूं तप न पाया?

      हैरानी है मुझे उन किस्से कहानियों पर,

       जो बखान करते हैं यूं तप कर चमक जाने का!

        

        न चमक पाया मैं इतना जलकर भी,

         क्या कोरे झूठ पे टिकी है दुनियां?

          अब इतना भी ईंधन नहीं कि जल सकूं थोड़ा।

           चमकने को थोड़ा काश जमा कर सकूं थोड़ा।


           प्रशांत "अंजान"

Saturday, 15 September 2018

सब निरंतर अग्रसर हैं

कितना कुछ रह जाता है 
छूट जाता है 
और गुज़र भी रहा है 
पीछे 
न भरने वाले खड्ड मे समाता हुआ, 
एक अंतहीन खड्ड 
अंतहीन स्थान के साथ 

सब निरंतर अग्रसर हैं 
उनमे मैं भी हूँ 

जब तक हूँ,
अनेक स्मृति हैं 
बनीं हुई और बन रही 
गुज़रना इनका भी निश्चित है 

न होने पर 
अन्य की स्मृतियों में हूँ 
उनके स्मृतिलोप होने तक 
जब 
सब निरंतर अग्रसर हैं 

प्रशांत "अंजान "

Saturday, 8 September 2018

मुझे मुक्त कर दे

रोज़ मांगता हूँ उस से 
मुक्त कर दे 
मेरे "मैं " से 
मुझको मुक्त कर दे 
चेष्टा करता हूँ 
पर असफल हूँ 
मुझे मेरे "पर्दों " से मुक्त कर दे 
मैं रोता हूँ 
पर रोना भी एक पर्दा है
मुझ रोने से मुक्त कर दे 
तेरी वेदी पर अपने मैं को रख दूँ
विलीन कर अपने "मैं " में 
सब से मुझको मुक्त का दे 

प्रशांत "अंजान "







फोटो श्रेय - गूगल से साभार 

Wednesday, 5 September 2018

प्रण

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हे परम शब्द,
मेरे शब्द को अपने में स्थायित्व प्रदान कर |
समाहित कर
कि मैं गिरूं ना|
मेरी चेतना को विस्तार दे 
ताकि 
जागृत कर सकूँ 
उस परम पुंज को 
जिससे सर्जित किया है तूने 
मुझे और अन्य पुंजों को |
अपने दिव्य पुंज में 
खुद को समर्पित करने का मार्ग प्रदान कर |
विकारों की जन्मदात्री , 
मेरे अंतस के उस अंश के विध्वंश हेतु 
मुझे सहयोग प्रदान कर |
मेरे प्रण को 
अपनी उपासना का 
तुच्छ रूप समझ 
इसे संबल दे |
ढृढ़ कर मुझे 
यूँ बने रहने को |

Friday, 31 August 2018

उसका भी वजूद हो ....

कितना मधुर हो सकता है ,
पाना !
जिस तरह आप सोचते हैं ,
हूबहू वैसे ही पाना |
जैसे ,
सपनो का भी वज़ूद हो |

दूर ना हो वो 
वो ख़्याली ना हो ,
उसका भी वज़ूद हो |

अनेक कहें यथार्थवादी बनो ,
न जीओ वो ,
संभव नहीं जो |

मैं ना जीऊं तो चैन नहीं !
दिल यूँ ही बेचैन सही |

मधुर रहा हैं यूँ ही जीना,
बेचैनी ने तो हक़ ना छीना |

इतना ही काफ़ी रहा ,
चूल्हा ईंधन से जलता रहा |

 प्रशांत "अंजान "









फोटो श्रेय - गूगल से साभार

Wednesday, 29 August 2018

यादें


वो यादें अजीब हैं 
दर्द देती‌ं है वो 
परिचित है अभी भी 
पर अब कहाँ है ?
दुःख है बहुत 
खेद है जीने का उन्हें |

क्यूँ  ?
आखिर क्यूँ जिया मैं ?
उन्हें जो हैं अब लापता 
वीरानो में कहीं 

वो अच्छी  थी 
पर अब सोचूं  तो दर्द क्यूँ 
अजीब सी है चुभन |

फिर नहीं पा सकता हूँ माना 
फिर भी आती है हृदय को दुखाने 
बिन बताये 

मन से पूछूं ,बताओ कैसी हैं वो ?
शब्द एक "अनमोल " |
फिर क्यूँ  रोए तू 
उन्हें सोच कर |

कहता है !
वो थी कभी , पर 
अब नहीं हैं 
इसीलिए ह्रदय भी दुरुस्त नही है 
दुःखता है वो 
जब लाता है तू उन्हें 
अतीत के झरोखों से |

उन्हें वहीं तक सीमित रहने दे ......

by prashant "अंजान "



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Tuesday, 28 August 2018

आँखें

ये मुझे कमजोर कर रहीं हैं 
ये कुछ आँखें हैं सपने लिए 
जो निहार रही हैं उन्हें 
हैं जो मीलों दूर 
कुछ उम्मीदें लिए |
ये सिर्फ़ मेरी नहीं हैं 

Monday, 27 August 2018

अनेक से एक

लिखने को जैसे बहुत कुछ है |
विपुल भंडार जैसे भरा है कही |
पर अनेक से एक चुनना आसान नहीं| 
"एक" लिखना आसान नहीं |
शेष का क्या ?
उन्हें भी मार्ग चाहिए |
अब घुटन होने लगी है |
कहने को भौतिक रूप नहीं |
पर उनसे ना जाने कितनी हैं बड़ी |
 
प्रशांत "अंजान"

Tuesday, 21 August 2018

जब देखा मैंने उसे

मैंने देखा उसे 
वो मुस्कुरा रही थी 
अपने कुछ परिचितों के साथ 
मंद मंद शीतल पवन सी 
कुछ बह रही थी आज 
वो रमणीय है 
मन में रमने वाली 
भीड़ में भी है कांति निराली 
अब क्या करुँ 
जानता नहीं एक शब्द मात्र 
शायद मै ना बन सकूँ 
हमसफ़र उसका 
शायद ना मिले उसका साथ 
पर सोचना इतना 
मुझे पीड़ा देता है अपार 
जिंदगी पहले ही बेहतर थी 
पर अब ना होगा उस बेहतरी का साथ 

प्रशांत अंजान 

Monday, 20 August 2018

जैसे हो वैसा है संसार

तुम साफ हो, तो साफ़ है संसार भी 
निश्चित हो, तो निश्चित है वह 
जैसा है अंतस, वैसा  है संसार 
निर्भर है तुम पर 
की कैसा है संसार

बदलोगे, तो बदलेगा 
जैसा देखते हो, दिखेगा 
मात्र वही है ,जो तुम हो 

जैसी करनी है , वो करता है वही 
जैसा बोलोगे ,वो भी  कहेगा 
जैसा सूंघना चाहते हो ,वैसी ही महक 
जैसा रस चाहोगे , वैसा ही 
वो तुम से है 
है तुम तक ही |

Tuesday, 31 May 2016

थोड़ा बोलें

जो न बोले हैं कुछ अब तक
वो भी थोड़ा बोले
चुप्पी साध रखी है अब तक
थोड़ा मुँह तो खोले
अब क्या शिखर पाना नहीं
जो ऊँचाई देख कर सिहर रहे
अंदर के पंछी से कह दो
पर को थोडा खोले
अब उडना है आसमान से
सितारों की ऊंचाई तक
कह दो अब अवरुद्धो से
पथ को यूँ ना रोके
अब चुप्पी और ना बोलेगी
चुप्पी से नाता तोडें
जो न बोले हैं कुछ अब तक
वो भी थोड़ा बोले

Monday, 30 May 2016

दुख पसंद है

आँसुओं में डूबा हुआ, मैं खुद को खुद तक पाता हूँ,
हृदय पर चोट खाकर, मैं खुद को ढूंढ पाता हूँ,
कुछ जुडाव सा है, एकांत से मेरा,
दर्द लगता है कुछ अपना सा मेरा।
दलित सी है मनःस्थिति मेरी,
विस्मृत सा हूँ मैं, हूँ खुद में तन्हा,
कुछ ऐसी ही है हृदय की व्यथा।

Friday, 20 May 2016

मैं एवं मेरी पीडा....

अभी अभी संध्या चली गई
रजनी को बुलावा दे गई
कुछ क्षण में तिमिर आगमन हुआ
लहर चुप्पी की बह गई
अब मैं हूँ और मेरा ध्यान है
फिर भी न पूर्ण संज्ञान हैं
और भी हैं समीप यहीं
माना वो अंजान है
सो तो सकते हैं वो सभी
हमको तो नींद नसीब नहीं
कोशिश करता हूँ मैं बहुत
पर करवटें बदलता रहता हूँ
लाख जतन कर लिए
स्वयं को कोसता रहता हूँ
जुगत लगाता हूँ बहुत
पर असमर्थ खुद को पाता हूँ
कभी कभी तो यूँ ही मैं
सहसा बडबडाता हूँ
क्या है ये और
क्यूँ मुझे खाता है?
निद्रा के वक्त भी मुझे
इतना तड़पाता है
क्या ये वो मेरे स्वप्न हैं
जो मुझको सोने देते नहीं
चुभते है मेरी आँखों में
और देते हैं अश्रुओं की नमी।
नहीं चाहता इन स्वप्नों को
यह निरा खल है
मुझे सोने न देने का
मेरा स्वयं से छल है
पर ये कपटी मन है
मोल देता है इन ख्वाबो को
कहने को तो ये मेरा है
पर आता नहीं है काबू में

Saturday, 20 February 2016

पतझड़ी पात


तुमने पतझड़ी पातो को देखा होगा।
प्रतीत होता है, मै भी हूँ।
गिर रहा हूँ, बिना ध्येय के।
ना कोई प्राण शेष है अब।
सिवाय निर्जीव श्वासों के।
ना है कोई दिशा, दिशाहीन हूँ।
हवाओं के झोंके तय करेंगे मेरा भाग्य।
निश्चित ही धरातल तक है सफर मेरा।
कब तक ये झोंकेे साथ ले जाएँगे।
सफर तो खत्म होना ही था।
आकांक्षाएं धूमिल होनी ही थी।
अब निर्जीव श्वासों ने भी साथ छोड़ दिया।
हरित वर्ण न जाने कब स्याह हो गया।

Wednesday, 3 February 2016

क्या सोचते हैं वो?

क्या सोचते हैं?


क्या सोचते हैं वो,
क्या कर लेंगे?
इन दो-चार बुजदिल हरकतों से,
क्या दुनिया मुट्ठी में कर लेंगे।
पता नहीं है उनको ये,
यहाँ बंदूक उगाई जाती है।
मातृभूमि पर मर-मिटने की,
लौ जलाई जाती है।
जिस देश के बाशिंदे है हम,
वहाँ सूर्य अस्त नहीं होता।
पैदा होते हैं वीर जहां पर,
वहां वीरगति पर मातम नहीं होता।
अपनो पर मरने-मिटने की,
इच्छा का ह्रास नहीं होता।
क्या सोचते हैँ वो,
क्या कर लेंगे?
इन दो-चार गीदड़ भभकी से,
क्या शस्त्र हम अर्पण कर देंगे।
भान नहीं है उनको ये,
यहाँ फौलाद बनाये जाते हैं।
वैरी के सर कलम करने के,
हथियार बनाये जाते हैं।
जिस देश में भगतसिंह रहता है,
वहां फिरंगी क्या डट पाया था?
फिर कौन है वो ?
और क्या उनकी हस्ति है?
अस्तित्व तक उनका मिट जाना है।

पतझड़ी पात

तुमने पतझड़ी पातो को देखा होगा। प्रतीत होता है, मै भी हूँ। गिर रहा हूँ, बिना ध्येय के। ना कोई प्राण शेष है अब। सिवाय निर्जीव श्वासों ...